दूर जितना ही मुझसे जाएंगे
मुझको उतना क़रीब पाएँगे
फिर से खुशिओं के अब्र छाएंगे
डूबते तारे झिल मिलाएंगे
कुछ न होगा तो आंख नम होगीं
दोस्त बिछड़े जो याद आएंगे
माना पतझड में हम हुए वीरां
अब के सावन में लहलहाएँगे
इक ग़ज़ल तेरे नाम की लिखकर
सुबह ता शाम गुनगुनाएँगे
salimraza rewa

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